सोमवार, 30 नवंबर 2009

खाद्य सामग्री के मूल्य तय करने का अधिकार किसानो के पास हो ना की सरकार के पास

भारत में किसान के आर्थिक समागिक विकास के लिए देश के शहरी क्षेत्र में महँगाई नितांत आवश्यक है ?
देश के शहरी क्षेत्र में महँगाई नितांत आवश्यक है ?????????????? आप को लगेगा की या तो मै पागल हु या आप के जख्मो पर नमक डाल रहा हू, ऐसा कुछ भी नहीं और ना ही मै गाव में रह रहा हू आप की तरह वेतन भोगी हू, दाल चवाल आटे चीनी सभी के दामो से वाकिफ हू आप थोड़ा हट के सोचिये एक और आटे के दामो पर आप और हम रोते है एक पिज्ज़ जो 50graam से भी कम आटे का होगा, आप में से कभी भी किसी ने नहीं कहा होगा महगा है | पेप्सी कोला के दामो पर किसी को ऐतेराज नहीं कितना भी लूटो खुली छुट है | एक किसान जो ३ से 4 माह में एक - दो क्वंटल सब्जी या दाल या ६ माह में गेहू का उतपादन करता है और अब स्वयं की कीमत को पहिचानता है देश में हाय तोबा मची है | एक बहुराष्टिरिये कंपनी में या सरकारी सेवा करने वाले को एक माह में ३०००० से १००००० और १००००० से १०००००० की वेतन लेने का हक़ है तो उन किसानो को भी अपने बच्चो के साथ खुशहाली से जीवन यापन का पूरा हक़ है रही बात मजदूरों की मै तो कहता हू कि आम मजदूर की मजदूरी काम से काम ५०० रु. प्रती दिन होनी चाहिये | आप जिस डीसल और पेट्रोल को ४५ से ५० रु लीटर में खरीदते है अनिल अम्बानी, सुनील मित्तल और रतन टाटा से लेकार पी.ऍम. ,सी ऍम. से लेकार अई. पी. एस. अई. ए एस. और सचिन,धोनी से लेकार प्रभु चावाला और प्रतिश नन्दी सभी को ४५ से ५० रु लीटर में ही डीसल और पेट्रोल मिलता है आप दिन में २ से १० लीटर और ये सभी १०० से १००० और १०००० लीटर उपयोग करते है सरकार किस पर और किन्हें सब्सिडी दे रही है और क्यों ??? क्या ये सभी बाजार के वास्तविक मूल्यों पर डीसल और पेट्रोल नहीं खरीद सकते है ????? अगर ये सभी १.५ से २० करोड़ की कार रख सकते है तो डीसल और पेट्रोल पर आम आदमी की तरह सब्सिडी क्यों ??????????खाद्य सामग्री के मूल्य तय करने का अधिकार किसानो के पास हो ना की सरकार के पास सरकार को विचोलिये कि भूमिका से हट जाना चाहिए और किसानो को बाजार की खुली प्रतियोगिता का हिस्सा वनाना होगा तभी देश में किसानो को हक़ मिलेगा, किसानो को कर्ज और फिर कर माफी सरकारों का पाखंड है और ये पाखंडी लोग ही किसानो की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है अब जब कि किसानो को पता है की दामो का खेल उन के हाथो में है सरकार किसानो की मदद करने की जगह नए नए रस्ते खोजने में लगी है जब रिलांस, बिग बाजार , सुभीक्षा जैसे लाखो किसानो की कमाई पर हाथ साफ करते रहे तब सरकार चुप रहती है और आलू प्याज और डालो के दाम बढ़ाते ही चाहू और कोहराम क्यों मच जाता है हमारे हिसाब से तो अगर सरकार एस वक्त किसी भी वास्तु के आयात करनी की सोच रही है तो किसानो की पुन्हा दिल्ली पर धावा कर के संगठित होने का एहसाह सरकार और पूजी वादीयो को करवा देना चाहिए तभी जय जवान जय किसान का नारा चिर्तार्था होता प्रतीत होगा वरना तो किसान और किसानो की राजनीती ही होगी
कवि हरदयाल कुशवाहा
युवा महा सचिव कुशवाहा समाज दिल्ली
दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

धरना और प्रदर्शनो के बाद ही जगती हुई सरकार




धरना और प्रदर्शनो के बाद ही जगती हुई सरकार
आदरनीय बन्धु,
आप सभी मित्रो को हम बुंदेलखंडवासी ने १७.०९.२००९ सुबह १०.०० बजे से जंतर-मंतर, दिल्ली पर बुंदेलखंड के आकाल पीडीतो और उन की उपेक्षाओं के विरोध मे विशाल धरना और प्रदर्शन से रुबरु करवाने के लिए सादर आमंत्रित किया था हमारे और आप सभी लाखो मित्रो के कार्यो का परिणाम आज परिणित हो रहा है केंद्र की सरकार के स्वीकार किया की बुंदेलखंड में आकाल की स्तिथी है हमें मागे थे हर जिले को१००० हजार करोड़ रु.,यानी १३ जिलो को १३००० केंद्र ने आधे दिए हां इतना जरुर कहा की अगले ३ वर्षो में और पैसे दिए जायेगे |






हमारी मुख्य माग को केंद्र ने जोर दार समर्थन दिया की जो रु. केंद्र आवंटित करेगी उनकी निगरानी योजना आयोग के सदस्य जो दोनों राज्यों की स्तिथी को देख रहे है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में गुरुवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बताया कि पैकेज के लिए आर्थिक साधन इन इलाकों में चल रही केन्द्रीय योजनाओं को समेकित कर जुटाये जायेंगे। इसके अलावा इस पैकेज के लिए केन्द्र उत्तार प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों को वर्ष 2009-10 से अगले तीन सालों में 3450 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता भी मुहैया करायेगी। करेगे | हमारी मांग थी की विंध्यांचल की पर्वत शेणी को पुन्हा संरक्षित किया जाये और याहा पर उगने वाले फल दार पैड पौधों को रक्षित किया जाये | सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने कहा की बुंदेलखंड में वनों को संरिक्षित किया जाएगा | राष्ट्रीय बुंदेलखंड जन विकास मंच के संरक्षक विधायक डॉ. एस. सी. एल. गुप्ता ने कहा की अगर केंद्र सरकार धरना और प्रदर्शनो के बाद ही जगती है तो हम बुंदेलखंड वासी और देश वासी संसद ,और जंतर-मंतर पर धरने और प्रदर्शनो पर बैठे रहेगे | गन्ना किसानो की याद सरकार को तब आती है जब ये लोग दिल्ली में धरना और प्रदर्शन करते है हम केंद्र सरकार से जानना चाहते है की देश को और आम जनता को क्यों धरना और प्रदर्शनो में उल्झाकार मुख्या मुद्दों से भटकाना चाहती है दिल्ली में बस किराया और फल सब्जियों से लेकार दूध के दाम सब में अती कर राखी है सरकार ने आप जनता के नुमन्दगी कर रहे है या किसी कंपनी की सेवा और ये सेवा राहुल जी और सोनिया जी की आप देश के पैसो से कैसे कर सकते है

कवि हरदयाल कुशवाहा मीडिया प्रभारी
राष्ट्रीय बुंदेलखंड जन विकास मंच

+91 9868004423, 9971639171
EVENT) Join Us at Vishal Dharna and Pradarshan, Jantar Mantar, Delhi (17 September 2009)

Date: 17-09-09
Agenda: Dharna and Meeting with Rahul Gandhi, Rajnath Singh, BSP Office at Delhi.

Organised By:
Rashtriya Bundelkhand Jan Vikas Manch
Reg Office:
D-16/4 Sangam Vihar
New Delhi - 110062
Mobile: 9868004423, 9811184644

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी


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Comments on: हिंदी से क्यों डरते हैं क्षेत्रीय राजनीति के विषधर

http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/

Tue, 17 Nov 2009 13:13:30 -0500
http://wordpress.org/?v=2.8.4
hourly
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By: Kavi HArdayal KUshwaha
http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4443
Kavi HArdayal KUshwaha
Tue, 17 Nov 2009 13:13:30 +0000
http://bundeleharboley.co.cc//?p=6966#comment-4443
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ???????? ना मराठी इन की बाप की बपोती हैना हिन्दी कुछ दोगलो की रखेल है कोई तों इन दोगलो से कहे की राखी सावंत तुम्हारे ही घर की बेटी थी क्यों ना सभाल पाए और अब जब की वाला साहेब ठीक से उठ-बैठ नहीं पते हैतों समाना मे सम्पदयाकी और आर्टिकल कोन लिख रहा होगा,कोई पूछे तों राज और उद्धव ठकारे से बेटा- बेटी और वीबी किस भाषा मे पडी लिखी है कुत्ते की भोक और शेर की दहाड़ मे अंतर होता है मेरे दोस्त .................... जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली हिंदी बिंदी वाणी रहे ,सुनो हरवोलन की बोली जाने किके जाये तुम, जाने किन की बोली सबरी गुईया (भाषा)मिल जुल कहे उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी हरबोला जू कह रहे,हर-हर बम-बम बोली
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उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी


जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ????????


ना मराठी इन की बाप की बपोती हैना हिन्दी कुछ दोगलो की रखेल है कोई तों इन दोगलो से कहे की राखी सावंत तुम्हारे ही घर की बेटी थी क्यों ना सभाल पाए और अब जब की वाला साहेब ठीक से उठ-बैठ नहीं पते हैतों समाना मे सम्पदयाकी और आर्टिकल कोन लिख रहा होगा,कोई पूछे तों राज और उद्धव ठकारे से बेटा- बेटी और वीबी किस भाषा मे पडी लिखी है कुत्ते की भोक और शेर की दहाड़ मे अंतर होता है मेरे दोस्त ………………..

जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली

हिंदी बिंदी वाणी रहे ,सुनो हरवोलन की बोली

जाने किके जाये तुम, जाने किन की बोली

सबरी गुईया (भाषा)मिल जुल कहे

उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी

हरबोला जू कह रहे,हर-हर बम-बम बोली




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By: Mithilesh Chaubey
http://http://bundeleharboley.co.cc//11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4374
Mithilesh Chaubey
Wed, 11 Nov 2009 10:19:33 +0000
http://bundeleharboley.co.cc//?p=6966#comment-4374
सर आपने सच को जिस तरह से शब्दों में बयां किया है, वह स्वागत योग्य है। इत्तेफाक से मैं भी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल का ही छात्र रहा हूँ, तो एक छात्र होने के नाते मुझे इस बात का गर्व है कि, आज भी माखनलाल में बेहतरीन शिक्षक मौजूद हैं, जो पत्रकारिता जगत को और समाज के रोशन करने में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं।
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- सर आपने सच को जिस तरह से शब्दों में बयां किया है, वह स्वागत योग्य है। इत्तेफाक से मैं भी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल का ही छात्र रहा हूँ, तो एक छात्र होने के नाते मुझे इस बात का गर्व है कि, आज भी माखनलाल में बेहतरीन शिक्षक मौजूद हैं, जो पत्रकारिता जगत को और समाज के रोशन करने में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं।



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By: M Venkateshwar
http://http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4365
M Venkateshwar
Tue, 10 Nov 2009 17:05:18 +0000
http://bundeleharboley.co.cc//?p=6966#comment-4365
हिन्दी भाषा का अपमान और हमला करने वाला देश द्रोही की श्रेणी में आता है.ऐसे लोगों को नहीं बख्शना चाहिए. यह एक प्रकार की पाशविक हिंसा और क्रूरता ही है कि महाराष्ट्र विधान सभा में सरे आम एक विधायक को हिन्दी में शपथ ग्रहण के अवसर पर बेइज़्ज़त किया गया और हिन्दी जो कि निश्चित ही राष्ट्रभाषा है उसका इस तरह घोर अपमान किया गया.जो हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं मानते उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है.मराठीवाद की तरह ही हिन्दीवाद भी एक बहुत बडी राष्ट्रीय भावना और चेतना है. यह समूचे राष्ट्र की चेतना है. हिन्दी का गौरव मराठी का भी गौरव है.हिन्दी में बोलने से मराठी का मान कम नहीं होता, बल्कि बढता है.अंग्रेज़ी के उपयोग की तुलना में भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिन्दी का प्रयोग तो संवैधानिक ही है. किसी बःई मुद्दे पर असहमतियां स्वीकार्य हैं लेकिन हमला और हिंसा भारतीय संस्कृतिक आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है. हिन्दी के प्रयोग का अधिकार हर भारत वासी को देश के किसी भी प्रदेश में बेरोकटोक करने का अधिकार है ( संवैधानिक ) और इसे कोई नहीं छीन सकता. प्रान्तीयता, स्थानीयता, क्षेत्रीयता जैसी संकुचित सोच को भडका कर राजनेता जो वोट बैंक की सस्ती राजनीति कर रहे हैं, वे अन्त में कहीं के नहीं रहेंगे. कल की घटना देश के हित्में नहीं है. हमें समूचे देश की एकता की भावना को सुदृढ बनाना है न कि संकुचित प्रांतीयता को बढावा देना चाहिए. एम वेंकटेश्वर
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हिन्दी भाषा का अपमान और हमला करने वाला देश द्रोही की श्रेणी में आता है.ऐसे लोगों को नहीं बख्शना चाहिए. यह एक प्रकार की पाशविक हिंसा और क्रूरता ही है कि महाराष्ट्र विधान सभा में सरे आम एक विधायक को हिन्दी में शपथ ग्रहण के अवसर पर बेइज़्ज़त किया गया और हिन्दी जो कि निश्चित ही राष्ट्रभाषा है उसका इस तरह घोर अपमान किया गया.जो हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं मानते उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है.मराठीवाद की तरह ही हिन्दीवाद भी एक बहुत बडी राष्ट्रीय भावना और चेतना है. यह समूचे राष्ट्र की चेतना है. हिन्दी का गौरव मराठी का भी गौरव है.हिन्दी में बोलने से मराठी का मान कम नहीं होता, बल्कि बढता है.अंग्रेज़ी के उपयोग की तुलना में भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिन्दी का प्रयोग तो संवैधानिक ही है. किसी बःई मुद्दे पर असहमतियां स्वीकार्य हैं लेकिन हमला और हिंसा भारतीय संस्कृतिक आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है. हिन्दी के प्रयोग का अधिकार हर भारत वासी को देश के किसी भी प्रदेश में बेरोकटोक करने का अधिकार है ( संवैधानिक ) और इसे कोई नहीं छीन सकता. प्रान्तीयता, स्थानीयता, क्षेत्रीयता जैसी संकुचित सोच को भडका कर राजनेता जो वोट बैंक की सस्ती राजनीति कर रहे हैं, वे अन्त में कहीं के नहीं रहेंगे. कल की घटना देश के हित्में नहीं है. हमें समूचे देश की एकता की भावना को सुदृढ बनाना है न कि संकुचित प्रांतीयता को बढावा देना चाहिए.

एम वेंकटेश्वर




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By: Manoj Kumar
http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4364
Manoj Kumar
Tue, 10 Nov 2009 14:54:19 +0000
http://bundeleharboley.co.cc//?p=6966#comment-4364
मेरा दुर्लभ देश आज अवनति से आक्रांत हुआ, अंधकार से मार्ग भूलकर भटक रहा है भ्रांत हुआ। तो भी भय की बात नहीं है हिन्दी1 पार लगावेगी, अपने मधुर स्निग्द्ध नाद से अनन्त भाव जगावेगी। यह विश्वास है।
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मेरा दुर्लभ देश आज अवनति से आक्रांत हुआ,

अंधकार से मार्ग भूलकर भटक रहा है भ्रांत हुआ।

तो भी भय की बात नहीं है हिन्दी1 पार लगावेगी,

अपने मधुर स्निग्द्ध नाद से अनन्त भाव जगावेगी।

यह विश्वास है।




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By: सुभाष नीरव
http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4362
सुभाष नीरव
Tue, 10 Nov 2009 14:09:06 +0000
http://bundeleharboley.co.cc//?p=6966#comment-4362
संजय जी आपने बिलकुल सही लिखा है कि "हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे कोई कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।" प्रांतीय/क्षेत्रिय दलों के नेताओं का इस प्रकार के सिरफिरे कृत्य करके क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा देना शोभा नहीं देता है। ऐसा करके वे जिस शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं, वस्तुत: वह शक्ति स्वय में ही आधारहीन और खोखली है।
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- संजय जी आपने बिलकुल सही लिखा है कि “हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे कोई कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।” प्रांतीय/क्षेत्रिय दलों के नेताओं का इस प्रकार के सिरफिरे कृत्य करके क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा देना शोभा नहीं देता है। ऐसा करके वे जिस शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं, वस्तुत: वह शक्ति स्वय में ही आधारहीन और खोखली है।



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हिंदी से क्यों डरते हैं क्षेत्रीय राजनीति के विषधर

हिंदी से क्यों डरते हैं क्षेत्रीय राजनीति के विषधर

उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी

जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ????????

ना मराठी इन की बाप की बपोती हैना हिन्दी कुछ दोगलो की रखेल है कोई तों इन दोगलो से कहे की राखी सावंत तुम्हारे ही घर की बेटी थी क्यों ना सभाल पाए और अब जब की वाला साहेब ठीक से उठ-बैठ नहीं पते हैतों समाना मे सम्पदयाकी और आर्टिकल कोन लिख रहा होगा,कोई पूछे तों राज और उद्धव ठकारे से बेटा- बेटी और वीबी किस भाषा मे पडी लिखी है कुत्ते की भोक और शेर की दहाड़ मे अंतर होता है मेरे दोस्त ....................
जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली
हिंदी बिंदी वाणी रहे ,सुनो हरवोलन की बोली
जाने किके जाये तुम, जाने किन की बोली
सबरी गुईया (भाषा)मिल जुल कहे
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
हरबोला जू कह रहे,हर-हर बम-बम बोली

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

बम-बम बोल हर-हर बोल "बुंदेले हरबोले" हरी के वचन सुनो दो चार




"बम-बम बोल हर-हर बोल ........
...........हरी के वचन सुनो दो चार"
"बुंदेले हरबोले"




बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, के बोल आज भी बुंदेलखंड क्षेत्र में गूंज रहे हैं, लेकिन इन किस्से-कहानियों में जान फूंकने वाले बसदेवा या बुंदेले हरबोले अब विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं, जिनके जिक्र के बिना भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की कहानी पूरी नहीं हो सकती।
11 मई 1857 की भारत की आजादी की पहली लड़ाई के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर पूरा देश भारत माता के उन सपूतों को याद कर रहा है जिन्होंने अपने-अपने तरीके से देश की आजादी के लिए अपना तन-मन-धन न्यौछावर किया। ऐसे अवसर पर बसदेवाओं व बुंदेले हरबोलों को याद करना उनकी दम तोड़ती परंपरा को नई जिंदगी दे सकता है।
बसदेवाओं द्वारा भारत की आजादी की पहली लड़ाई में दिए गए योगदान के सिलसिले में डा. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर, लेखक व पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष सुरेश आचार्य ने बताया कि बसदेवा अल सुबह बस्तियों में एक खास धुन में गाते हुए दान लेने जाते थे। अंग्रेजों के खिलाफ मंगल पांडे की आजादी की अलख को गांव-गांव में द्वार-द्वार तक ले जाने में बसदेवाओं ने सक्रिय भूमिका निभाई।
उन्होंने आजादी की लड़ाई के प्रतीक कमल के फूल व रोटी को समाज के कोने-कोने तक पहुंचाया। कहा तो यह भी जाता है कि सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता झांसी की रानी की रचना इन्हीं हरबोलों के बखान से प्रभावित रही।
बसदेवाओं के बारे में कहा जाता है कि वे अपने आपको वासुदेव कृष्ण के वंशज मानते थे। तब के वसुदेव ही आज के बसदेवा के नाम से जाने जाते हैं। ये शुरुआत में कृष्ण की लीलाओं पर आधारित गीत गाते थे। बसदेवा समाज की परंपरा का निर्वाह करने वाले लोग खासतौर पर भोर के साथ ही गांवों में लोगों को जगाने का काम करते थे। इसकी एवज में गृहिणियों से अन्न व वस्त्र के रूप में मिले दान से ही ये अपना गुजारा चलाते रहे।
सागर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता दिवाकर राजपूत के मुताबिक हालांकि बसदेवा गायकी आज एक लुप्तप्राय सामाजिक परंपरा है पर इसके अपने समय में बडे़ गहरे सामाजिक सरोकार थे। उन्होंने कहा कि उस वक्त आज के समान संचार के साधन तो थे नहीं सो सामाजिक व धार्मिक मूल्यों की बातों को गुनगुना सकने वाली आसान सी धुनों के माध्यम से आम जन तक पहुंचाने का असरदार जरिया बन गई थी बसदेवा गायकी।
डा. आचार्य बताते हैं कि बसदेवा सिर्फ अपनी गायकी के अलहदा अंदाज के लिए ही नहीं जाने जाते हैं, उनका रहन सहन व पहनावा भी कुछ कम रोचक नहीं था। जब बसदेवा भिक्षा मांगने के लिए निकलते थे उस समय उनके हाथ में लकड़ी की बनी हुई खड़ताल की टंकार उन्हें लयबद्ध बनाए रखती थी। रंगे सन से बनी टोकरियों को उल्टा कर सर पर टोप की भांति लगाए रहते थे। उनके सर की शोभा बढ़ाती ये टोकरियां बुनाई कला का अद्भुत नमूना होती थीं जिनमें आटा, दाल व बेसन जैसी सामग्री भी रखी जा सकती थी। इसके अलावा रंगबिरंगी लाठी, कंधे पर लटका झोला इनकी वेशभूषा का खास अंग होते थे।
बसदेवाओं के बारे में अपने बचपन की यादें ताजा करते हुए सागर के एक पुस्तक व्यवसायी राजेश केशरवानी ने बताया कि अक्सर गर्मियों के दिनों में जब हम खुले आंगन में सोते थे तो सुबह नींद बसदेवाओं की खड़ताल की खनक पर गाए जाने वाले गीतों को सुनकर ही टूटती थी।
घर के लोगों द्वारा अनाज व वस्त्र के रूप में दान मिलने के बाद वो नाम जरूर पूछते थे और उसके बाद अगले द्वार तक पहुंचने तक वह दानदाता का नाम लेकर गीत के माध्यम से कृतज्ञता प्रकट करते रहते थे। गीत की हर पंक्ति की समाप्ति में वो हरे मोरे राम जरूर जोड़ते थे।
बसदेवा गायकी की पारंपरिक विविधताओं के बारे में डा. आचार्य ने बताया कि वर्तमान उत्तर प्रदेश राज्य के हिस्से में आने वाले बुंदेलखंड तक इनका प्रभाव था। मध्यप्रदेश में जहां ये अपने गाने के बाद हरे मोरे राम की टेक देते थे। उत्तर प्रदेश वाले इलाके में ये हर हर गंगे की टेक लगाते थे।
बसदेवाओं की जिंदगी पर अध्ययन कर रहे ओपी चौबे ने बताया कि वर्तमान में यह परंपरा खत्म सी हो चली है। मुश्किल से 40-50 लोग ही अब इस परंपरा का निर्वाह करते नजर आते हैं। सागर जिले की बंडा तहसील के दो गांव उमरारी व उलदन में ही इनकी महज दो-ढाई सौ की आबादी रह रही है। उन्होंने कहा कि बसदेवाओं की लुप्त होती परंपरा के संरक्षण की दिशा में केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत है।
सागर शहर में आज भी बसदेवा गायकी व परंपरा के मुताबिक जीवन-यापन कर रहे 75 वर्षीय धनपत बताते हैं कि अब समय बदल गया है, शहरों में देर से उठने के चलन से हमारी सुबह की टेर उनको नींद में खलल लगती है। उन्होंने कहा कि समाज में अपराध बढ़ने से डरे लोग अब हमें अपना नाम बताने से भी कतराते हैं। यहां तक कि हमारे बच्चे भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। वह पढ़-लिखकर नौकरी या धंधा-पानी करना चाहते हैं।
वर्षो से हमारा पारंपरिक ज्ञान बड़े ही सहज अंदाज में नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम बसदेवा बखूबी करते आए हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान के सहज प्रवास को बनाए रखने वाली बुंदेले हरबोलों की इस परंपरा को संजोने और सहेजने की कोशिश देश की आजादी में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से योगदान देने वालों के प्रति देशवासियों की सच्ची श्रद्धांजलि साबित हो सकती है।

श्रोत http://in।jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4416854.html/print/