
"बम-बम बोल हर-हर बोल ........
...........हरी के वचन सुनो दो चार"
"बुंदेले हरबोले"
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, के बोल आज भी बुंदेलखंड क्षेत्र में गूंज रहे हैं, लेकिन इन किस्से-कहानियों में जान फूंकने वाले बसदेवा या बुंदेले हरबोले अब विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं, जिनके जिक्र के बिना भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की कहानी पूरी नहीं हो सकती।
11 मई 1857 की भारत की आजादी की पहली लड़ाई के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर पूरा देश भारत माता के उन सपूतों को याद कर रहा है जिन्होंने अपने-अपने तरीके से देश की आजादी के लिए अपना तन-मन-धन न्यौछावर किया। ऐसे अवसर पर बसदेवाओं व बुंदेले हरबोलों को याद करना उनकी दम तोड़ती परंपरा को नई जिंदगी दे सकता है।
बसदेवाओं द्वारा भारत की आजादी की पहली लड़ाई में दिए गए योगदान के सिलसिले में डा. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर, लेखक व पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष सुरेश आचार्य ने बताया कि बसदेवा अल सुबह बस्तियों में एक खास धुन में गाते हुए दान लेने जाते थे। अंग्रेजों के खिलाफ मंगल पांडे की आजादी की अलख को गांव-गांव में द्वार-द्वार तक ले जाने में बसदेवाओं ने सक्रिय भूमिका निभाई।
उन्होंने आजादी की लड़ाई के प्रतीक कमल के फूल व रोटी को समाज के कोने-कोने तक पहुंचाया। कहा तो यह भी जाता है कि सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता झांसी की रानी की रचना इन्हीं हरबोलों के बखान से प्रभावित रही।
बसदेवाओं के बारे में कहा जाता है कि वे अपने आपको वासुदेव कृष्ण के वंशज मानते थे। तब के वसुदेव ही आज के बसदेवा के नाम से जाने जाते हैं। ये शुरुआत में कृष्ण की लीलाओं पर आधारित गीत गाते थे। बसदेवा समाज की परंपरा का निर्वाह करने वाले लोग खासतौर पर भोर के साथ ही गांवों में लोगों को जगाने का काम करते थे। इसकी एवज में गृहिणियों से अन्न व वस्त्र के रूप में मिले दान से ही ये अपना गुजारा चलाते रहे।
सागर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता दिवाकर राजपूत के मुताबिक हालांकि बसदेवा गायकी आज एक लुप्तप्राय सामाजिक परंपरा है पर इसके अपने समय में बडे़ गहरे सामाजिक सरोकार थे। उन्होंने कहा कि उस वक्त आज के समान संचार के साधन तो थे नहीं सो सामाजिक व धार्मिक मूल्यों की बातों को गुनगुना सकने वाली आसान सी धुनों के माध्यम से आम जन तक पहुंचाने का असरदार जरिया बन गई थी बसदेवा गायकी।
डा. आचार्य बताते हैं कि बसदेवा सिर्फ अपनी गायकी के अलहदा अंदाज के लिए ही नहीं जाने जाते हैं, उनका रहन सहन व पहनावा भी कुछ कम रोचक नहीं था। जब बसदेवा भिक्षा मांगने के लिए निकलते थे उस समय उनके हाथ में लकड़ी की बनी हुई खड़ताल की टंकार उन्हें लयबद्ध बनाए रखती थी। रंगे सन से बनी टोकरियों को उल्टा कर सर पर टोप की भांति लगाए रहते थे। उनके सर की शोभा बढ़ाती ये टोकरियां बुनाई कला का अद्भुत नमूना होती थीं जिनमें आटा, दाल व बेसन जैसी सामग्री भी रखी जा सकती थी। इसके अलावा रंगबिरंगी लाठी, कंधे पर लटका झोला इनकी वेशभूषा का खास अंग होते थे।
बसदेवाओं के बारे में अपने बचपन की यादें ताजा करते हुए सागर के एक पुस्तक व्यवसायी राजेश केशरवानी ने बताया कि अक्सर गर्मियों के दिनों में जब हम खुले आंगन में सोते थे तो सुबह नींद बसदेवाओं की खड़ताल की खनक पर गाए जाने वाले गीतों को सुनकर ही टूटती थी।
घर के लोगों द्वारा अनाज व वस्त्र के रूप में दान मिलने के बाद वो नाम जरूर पूछते थे और उसके बाद अगले द्वार तक पहुंचने तक वह दानदाता का नाम लेकर गीत के माध्यम से कृतज्ञता प्रकट करते रहते थे। गीत की हर पंक्ति की समाप्ति में वो हरे मोरे राम जरूर जोड़ते थे।
बसदेवा गायकी की पारंपरिक विविधताओं के बारे में डा. आचार्य ने बताया कि वर्तमान उत्तर प्रदेश राज्य के हिस्से में आने वाले बुंदेलखंड तक इनका प्रभाव था। मध्यप्रदेश में जहां ये अपने गाने के बाद हरे मोरे राम की टेक देते थे। उत्तर प्रदेश वाले इलाके में ये हर हर गंगे की टेक लगाते थे।
बसदेवाओं की जिंदगी पर अध्ययन कर रहे ओपी चौबे ने बताया कि वर्तमान में यह परंपरा खत्म सी हो चली है। मुश्किल से 40-50 लोग ही अब इस परंपरा का निर्वाह करते नजर आते हैं। सागर जिले की बंडा तहसील के दो गांव उमरारी व उलदन में ही इनकी महज दो-ढाई सौ की आबादी रह रही है। उन्होंने कहा कि बसदेवाओं की लुप्त होती परंपरा के संरक्षण की दिशा में केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत है।
सागर शहर में आज भी बसदेवा गायकी व परंपरा के मुताबिक जीवन-यापन कर रहे 75 वर्षीय धनपत बताते हैं कि अब समय बदल गया है, शहरों में देर से उठने के चलन से हमारी सुबह की टेर उनको नींद में खलल लगती है। उन्होंने कहा कि समाज में अपराध बढ़ने से डरे लोग अब हमें अपना नाम बताने से भी कतराते हैं। यहां तक कि हमारे बच्चे भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। वह पढ़-लिखकर नौकरी या धंधा-पानी करना चाहते हैं।
वर्षो से हमारा पारंपरिक ज्ञान बड़े ही सहज अंदाज में नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम बसदेवा बखूबी करते आए हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान के सहज प्रवास को बनाए रखने वाली बुंदेले हरबोलों की इस परंपरा को संजोने और सहेजने की कोशिश देश की आजादी में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से योगदान देने वालों के प्रति देशवासियों की सच्ची श्रद्धांजलि साबित हो सकती है।
श्रोत http://in।jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4416854.html/print/
झाँसी की रानी
जवाब देंहटाएंसिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
सुभद्रा कुमारी चौहान