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http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/
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http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4443
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उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ????????
ना मराठी इन की बाप की बपोती हैना हिन्दी कुछ दोगलो की रखेल है कोई तों इन दोगलो से कहे की राखी सावंत तुम्हारे ही घर की बेटी थी क्यों ना सभाल पाए और अब जब की वाला साहेब ठीक से उठ-बैठ नहीं पते हैतों समाना मे सम्पदयाकी और आर्टिकल कोन लिख रहा होगा,कोई पूछे तों राज और उद्धव ठकारे से बेटा- बेटी और वीबी किस भाषा मे पडी लिखी है कुत्ते की भोक और शेर की दहाड़ मे अंतर होता है मेरे दोस्त ………………..
जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली
हिंदी बिंदी वाणी रहे ,सुनो हरवोलन की बोली
जाने किके जाये तुम, जाने किन की बोली
सबरी गुईया (भाषा)मिल जुल कहे
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
हरबोला जू कह रहे,हर-हर बम-बम बोली
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- सर आपने सच को जिस तरह से शब्दों में बयां किया है, वह स्वागत योग्य है। इत्तेफाक से मैं भी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल का ही छात्र रहा हूँ, तो एक छात्र होने के नाते मुझे इस बात का गर्व है कि, आज भी माखनलाल में बेहतरीन शिक्षक मौजूद हैं, जो पत्रकारिता जगत को और समाज के रोशन करने में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं।
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http://http://bundeleharboley.co.cc//2009/11/10/sanjay-dwedi-writeup-on-hindi-marathi-controversy/comment-page-1/#comment-4365
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हिन्दी भाषा का अपमान और हमला करने वाला देश द्रोही की श्रेणी में आता है.ऐसे लोगों को नहीं बख्शना चाहिए. यह एक प्रकार की पाशविक हिंसा और क्रूरता ही है कि महाराष्ट्र विधान सभा में सरे आम एक विधायक को हिन्दी में शपथ ग्रहण के अवसर पर बेइज़्ज़त किया गया और हिन्दी जो कि निश्चित ही राष्ट्रभाषा है उसका इस तरह घोर अपमान किया गया.जो हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं मानते उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है.मराठीवाद की तरह ही हिन्दीवाद भी एक बहुत बडी राष्ट्रीय भावना और चेतना है. यह समूचे राष्ट्र की चेतना है. हिन्दी का गौरव मराठी का भी गौरव है.हिन्दी में बोलने से मराठी का मान कम नहीं होता, बल्कि बढता है.अंग्रेज़ी के उपयोग की तुलना में भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिन्दी का प्रयोग तो संवैधानिक ही है. किसी बःई मुद्दे पर असहमतियां स्वीकार्य हैं लेकिन हमला और हिंसा भारतीय संस्कृतिक आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है. हिन्दी के प्रयोग का अधिकार हर भारत वासी को देश के किसी भी प्रदेश में बेरोकटोक करने का अधिकार है ( संवैधानिक ) और इसे कोई नहीं छीन सकता. प्रान्तीयता, स्थानीयता, क्षेत्रीयता जैसी संकुचित सोच को भडका कर राजनेता जो वोट बैंक की सस्ती राजनीति कर रहे हैं, वे अन्त में कहीं के नहीं रहेंगे. कल की घटना देश के हित्में नहीं है. हमें समूचे देश की एकता की भावना को सुदृढ बनाना है न कि संकुचित प्रांतीयता को बढावा देना चाहिए.
एम वेंकटेश्वर
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मेरा दुर्लभ देश आज अवनति से आक्रांत हुआ,
अंधकार से मार्ग भूलकर भटक रहा है भ्रांत हुआ।
तो भी भय की बात नहीं है हिन्दी1 पार लगावेगी,
अपने मधुर स्निग्द्ध नाद से अनन्त भाव जगावेगी।
यह विश्वास है।
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- संजय जी आपने बिलकुल सही लिखा है कि “हिंदी आम आदमी के दुख-दर्द और मेहनत कर अपना पसीना बहाने वाले लोगों की भाषा है। इससे कोई कैसे जीत सकते हैं। यह मजबूर आदमी की भाषा है जिसे आप मार तो सकते हैं किंतु उससे उसकी भाषा छीन नहीं सकते। यह उसके हर्ष, विषाद, दुख, संघर्ष, उत्साह, विलाप और आर्तनाद की भाषा है। हिंदी एकता की भाषा है, देश को जोड़ने वाली भाषा है। वह राजनीति की शिकार जरूर है किंतु उसकी ताकत से हर देश को बांटने में लगी ताकत घबराती है – राज ठाकरे भी उसका एक उदाहरण है।” प्रांतीय/क्षेत्रिय दलों के नेताओं का इस प्रकार के सिरफिरे कृत्य करके क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा देना शोभा नहीं देता है। ऐसा करके वे जिस शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं, वस्तुत: वह शक्ति स्वय में ही आधारहीन और खोखली है।
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